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January 17, 2013

नागा साधुओं का रहस्य..

इलाहाबाद के संगम पर महाकुम्भ शुरू हो चुका है।  भारत के अध्यात्मिक प्रभुत्व का सबसे ज्वलंत प्रतीक, धरती पर आस्था का सबसे बड़ा मेला!  बारह साल बाद हो रहे इस वृहद् महासमागम ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।  लेकिन जिस एक पहलु ने हम सबको स्तब्ध किया है,  वो है नागा साधुओं का रहस्यमयी जीवन और उनके त्याग-समर्पण का वृहद् दर्शन


मेरा मानना है कि कम जानकारी और रहस्य किसी भी चीज़ का आकर्षण बढ़ा देता है।  नागा साधु भी हमारे आकर्षण का केंद्र रहे हैं क्यूंकि सिर्फ कुम्भ के दौरान ही ये अपनी बैरागी दुनिया से निकलकर हमारी पूँजीवादी दुनिया से रू-बरु होते हैं।  ...अरे नहीं नहीं, हम इनसे रू-बरु होते हैं; इनको भला क्या मतलब हमसे!

January 12, 2013

Swami Vivekananda - the Youth Icon..!!


The moment you hear 9/11, what strikes your mind?

Yes, most of us, even today, vividly remember the imageries of dreadful terror attacks on America. 9/11 is symbolic to a brutal launch of terrorism on an international scale.

But today, I would like to sway your attention towards a positive global event - the introduction of Vedanta & Yoga to the world ignorant of India's heritage & spiritual prowess, i.e. the launch of Hinduism on an international level.

Interestingly, this historic day was 9/11, when the World Parliament of Religions of 1893 took off in Chicago and Swami Vivekananda, a young chap in his twenties, stepped onto the world stage and presented Hinduism, the mother of all religions with a tint of nationalist flavour & left the audience spellbound.

I wish we remember 9/11 for what Vivekananda offered to us, than what an act of terror & hatred gave us.



My introduction to Swami ji was through a

October 25, 2011

दुनिया दीवानी दिवाली की..!!


असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

अभी बैठा बैठा कुछ विचार मंथन कर रहा था. दिवाली क्यूँ हम सब को एक समान आनन्दित करता है, समाज के हर तपके में रचा बसा और हर कोई इसका दीवाना है. दिवाली को नहीं पसंद करने वालो में सिर्फ वो गाय, बकरियाँ और कुत्ते ही क्यूँ होते हैं जिन्हें शायद ये पर्व मानव जाति की उनके खिलाफ कोई शाज़िश लगती है.

इस त्योहार ने मुझे भी हमेशा से सबसे ज्यादा आकर्षित किया है.  भारत में पर्व-त्योहार तो बहुतेरे हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति पर जो पैठ दिवाली ने बनायीं है वो अतुल्य है.  देश में हर क्षेत्र में और हर भाषा के महा-पर्व हैं.  छठ, दुर्गा-पूजा, गणेश चतुर्थी से लेकर पोंगल/ओणम तक सभी अपनी अपनी गली के शेर हैं.  लेकिन फिर भी दिवाली को इतने वृहद् पैमाने पर पूरे जनमानस में पसंद किया जाना हमेशा से एक सवाल रहा है मेरे लिए.

चलिए देखा जाये कि दिवाली से किस किस का सीधा सरोकार है.
उल्लास का ये पर्व दारु पीने वालो को भी उतनी ही ख़ुशी देता है, जितना कि नहीं पीने वालो को.  खरीदने वालो को भी उतना ही आनंद देता है जितना की बेचने वालो को.  हारो या जीतो, लेकिन जुआ खेलने के लिए आधिकारिक लाइसेंस दे देता है.
और सबसे बड़ी बात- जगमगाते दियों को देखकर कविता लिखने वाले कलाकार टाइप के लोगों के लिए भी दिवाली उतना ही बड़ा अवसर है, जितना की बमबारी करने वाले आतंकवादी टाइप के लोगों के लिए.  मतलब कि इस राष्ट्रीय पर्व में सबके लिए कुछ न कुछ है- बच्चे, बड़े, लड़के, लड़कियां, खरीददार, दुकानदार, शराबी, जुआरी, कवि या आतंकवादी. 

अब भला इतने बड़े प्रभाव क्षेत्र वाला कोई पर्व सुपर-हिट कैसे नहीं होगा!

दीपावली की पौराणिक मान्यताएं भी इसको एक मज़बूत आधार देता है.  श्री राम का अयोध्या आगमन हो, कृष्ण का नरकासुर वध, समुद्र-मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी का आविर्भाव, शिव और काली का मिलन या वामन अवतार के प्रसंग हो, दिवाली के धार्मिक उदभव में हर देवी-देवता का रोल है.  अर्थात आप किसी भी देवी-देवता के अनुयायी हों, दिवाली के प्रति आपकी आस्था तो बन ही जाती है.

यदि आप मान्यताओं के बजाये वास्तविक इतिहास को महत्व देते हैं तो भी आपके पास पर्याप्त कारण है दिवाली के मुरीद होने का.  इसी दिन राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ और एक नया सम्वत चलाने का निर्णय हुआ.  महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी इसी एतिहासिक दिन हुआ.  इतना ही नहीं, दिवाली के कुछ मुग़ल कालीन सेकुलर एंगल भी हैं जो इसके वोट बैंक को और बढाता है.

और अब कुछ दलील तर्कबाजों के लिए.
दिवाली में घरो की सफाई और रंगाई-पुताई त्योहार का सबसे अहम् हिस्सा है.  वर्षा ऋतु से उत्पन्न गन्दगी और कीटाणु इस रंग-रोगन, सफाई और आगजनी से पूर्णतयः नष्ट हो जाते हैं.  ये वैज्ञानिक पहलू उन चंद लोगों के लिए है जिनके लिए पौराणिक या एतिहासिक मान्यताएं काफी नहीं हैं किसी पर्व को मनाने के लिए.

इस पावन पर्व से हर किसी का आनंद, उल्लास और सरोकार होने के और भी आयाम हैं.  दिवाली की दीवानगी के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो है हमारा स्वार्थ.  आर्थिक फायदा, और बाज़ार का फायदा.  मेरे दर्शाए ये सारे पौराणिक, धार्मिक, एतिहासिक या वैज्ञानिक कारण कल को हमें यदि ना भी याद रहे, तो भी दिवाली चमकता रहेगा.  साल दर साल बढ़ता रहेगा. फलता फूलता रहेगा.  क्यूंकि यही एक पर्व है जो हमारे पूंजीवादी ढाँचे को चारा देता है.  बाज़ार की आग को हवा देता है.

भले ही इतिहास और पुराणों में अनेकों कारणों से मनाया गया हो, लेकिन सही मायनों में तो आज ये पर्व एक जश्न है बाज़ार में पैसों के आने का.  किसानों के फसल कट गए, हाथ में पैसे आ गए.  आपको नौकरी में ढेरो बोनस मिले.  घर में काम करने वाली को भी आपने पैसे दिए.  किसी ने ये खरीदा, किसी ने वो.  किसी ने कपड़े, किसी ने मिठाईयां.  किसी ने दारु पिया, किसी ने जुआ खेला.  और ये त्योहार सुपरहिट हो गया.

आप भी एक बार सोचिये, क्या है जो दिवाली को हिट बनाता है और लोगों को इसका दीवाना बनाता है?  धर्म, आस्था, परम्परा या बाज़ार??  आप क्या समझते हैं???

मुझे तो यही समझ में आया कि दिवाली में जितना योगदान दियों का है, उतना ही अमावस्या का भी!!

September 11, 2011

मैं अन्ना नहीं !!

बड़े दिनों से मैं कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन आज जाकर कलम घिस पा रहा हूँव्यस्तता की दुहाई मैं नहीं दूंगाअसल में अन्ना हज़ारे ने मुझे बाँध सा लिया थाऐसा माहौल बना दिया कि भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और लिखना मेरी काबीलियत से परे हो गया थाऔर अन्ना या उनके महा-आन्दोलन पर एक आलोचक की तरह लिखना मेरी हिम्मत से परे था. इस पवित्र आन्दोलन पर कोई समीक्षा सबको नागवार गुज़रती और आप मुझे ही भ्रष्टाचारी होने का तमगा दे देते. 

ख़ैर मैंने लिखा तो कुछ नहीं, लेकिन इस सीज़न को करीब से देखने और समझने की पूरी कोशिश कीबड़ा ख़ुशगवार सा मौसम था ये.  क्यूंकि, तरह तरह के घोटालों की गूँज के बाद अब जनमानस के गूंजने की बारी आयी थी.  ये सीज़न उम्मीदों का था, लोगों की संवेदनाओं का और सरकार से सवाल का था.  फिजा में ऊर्जा थी, भाईचारा था और साथ ही भ्रष्टाचार के प्रति अथाह आक्रोश.  माहौल ऐसा कि कलमाड़ी और राजा तिहाड़ में ही ज्यादा सुरक्षित फील कर रहे थे.  यदि बाहर भी होते तो "मैं अन्ना हूँ" लिखी टोपी पहनकर घूमते.

आन्दोलन से हमें एक चिंताजनक बात ये मालूम पड़ा कि देश में हर कोई खुद को ही अन्ना बताने लगा है.  भारत के गाँव-गाँव गली-गली में आपको "अन्ना" मिल जाते.  सबके सब अन्ना, पूरा देश अन्ना बन गया!  फिर इस आन्दोलन की आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी, किस से लड़ रहे हैं हम?


ज्वलंत से इस मौसम में मैंने अपने देश और देशवासियों के बारे में बहुत कुछ देखा और समझा.
लालू यादव जब आन्दोलन का विरोध करते हैं और "मैं अन्ना हूँ" बोलने से इनकार करते हैं, तो हमें समझ आता है.  इसमें उनकी सच्चाई झलकती है.  लेकिन जब बाकी का पूरा राष्ट्र खुद को अन्ना बताता है तो इसमें दोगलापन झलकता है.  मौकापरस्ती झलकती है, कौंग्रेस सरकार की कमजोरी और अन्ना की ताकत झलकती है.



अनशन और आन्दोलन के उस ख़ुशमिज़ाज़ मौसम में खुद को भ्रष्टाचार विरोधी साबित करने के लिए बस तीन चीज़ें चाहिए थीं - एक मोटर-साइकिल, एक तिरंगा और कुछ खाली समय.  ऐसी लहर चल रही थी कि मधु कोड़ा भी कहीं मोटर-साइकिल चलाते पाए जा सकते थे.

January 8, 2011

Ganga (In)action Plan !!


Originating from Gaumukh in the Gangotri glacier as a stream called Bhagirathi and culminating in Gangasagar, Ganga enlivens a culture and establishes a habitat along its 2,525 km bank. This holy river has been an epitome of Indian cultural and spiritual heritage since eternity. Infact, we can better say that India once lived on the banks of Ganga, but unfortunately today, India is crawling on its banks.


The Ganges, which once was a symbol of India’s spiritual supremacy, today symbolizes our inefficiency, inaction and ignorance, drawing a sorry state of affairs and ignorant bliss.

October 17, 2010

Games of our Common Wealth!

Ahha! Finally the games are over with good memories for some and good riddance for others. The games medal tally, though soothing to eyes, is not something I am very ecstatic about. Rather I am far more delighted for the fact that some of our non-cricketing sportspeople are hogging the limelight. Gratifying to see new faces who fought all odds to rise against the tide, being interviewed on national television.


However it is to be seen if this newfound attention towards sports other than cricket continues and for how long. And if this new love and spotlight is only on account of the gold haul but no genuine concern for sports then I have a better idea. The idea is that we can vouch for a Commonwealth of Asian games where only the Asian Commonwealth members would

August 30, 2010

उस पार मेरा भाई होगा..

पृष्ठभूमि है छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की जहाँ इन्द्रावती नदी के एक तट पर नक्सलीयों का पूर्ण कब्ज़ा है | कोई सरकारी कर्मचारी या पुलिस वहाँ वर्षों से नहीं गयी | कह सकते हैं कि वहाँ माओवादियों की ही सरकार चलती है | नदी के दूसरे तट के भूभाग पर नक्सल अधिकृत गाँव के विस्थापित शरणार्थी भारत सरकार द्वारा बसाए शिविरों में रहते हैं |
मेरी कविता इन्हीं में रह रहे एक पिता-पुत्र जोड़े के वार्तालाप की है | बेटे के पूछे जाने पर कि नदी के उस पार के दुश्मन कौन हैं जिन्होंने माँ को मार डाला, पिता भावुक हो जाता है क्यूंकि उसका अपना भाई भी एक माओवादी है |



उस पार हमारा दुश्मन है क्या

August 14, 2010

Are You Independent!


Decades earlier we fought the British for our Independence. Centuries ago we had the Mughals as outsiders. Digging even deeper in history we find our motherland being ruled by many such alien authorities and ill-intentioned powers. In simple words, we were not Independent.

Now that we celebrate an Independence day every year, paradoxically still,

December 8, 2009

Commonwealth Vs The Kumbh -Delhi leads, Allahabad lags

The government and the state machinery is exploiting all its resources and potential to elevate Delhi to a world class status. The rate of development despite political bottle-necks and bureaucratic red-tapes defies established norms. We all know the catalyst acting here -the Commonwealth games 2010.
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