बड़े दिनों से मैं कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन आज जाकर कलम घिस पा रहा हूँ. व्यस्तता की दुहाई मैं नहीं दूंगा. असल में अन्ना हज़ारे ने मुझे बाँध सा लिया था. ऐसा माहौल बना दिया कि भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और लिखना मेरी काबीलियत से परे हो गया था. और अन्ना या उनके महा-आन्दोलन पर एक आलोचक की तरह लिखना मेरी हिम्मत से परे था. इस पवित्र आन्दोलन पर कोई समीक्षा सबको नागवार गुज़रती और आप मुझे ही भ्रष्टाचारी होने का तमगा दे देते.
ख़ैर मैंने लिखा तो कुछ नहीं, लेकिन इस सीज़न को करीब से देखने और समझने की पूरी कोशिश की. बड़ा ख़ुशगवार सा मौसम था ये. क्यूंकि, तरह तरह के घोटालों की गूँज के बाद अब जनमानस के गूंजने की बारी आयी थी. ये सीज़न उम्मीदों का था, लोगों की संवेदनाओं का और सरकार से सवाल का था. फिजा में ऊर्जा थी, भाईचारा था और साथ ही भ्रष्टाचार के प्रति अथाह आक्रोश. माहौल ऐसा कि कलमाड़ी और राजा तिहाड़ में ही ज्यादा सुरक्षित फील कर रहे थे. यदि बाहर भी होते तो "मैं अन्ना हूँ" लिखी टोपी पहनकर घूमते.
आन्दोलन से हमें एक चिंताजनक बात ये मालूम पड़ा कि देश में हर कोई खुद को ही अन्ना बताने लगा है. भारत के गाँव-गाँव गली-गली में आपको "अन्ना" मिल जाते. सबके सब अन्ना, पूरा देश अन्ना बन गया! फिर इस आन्दोलन की आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी, किस से लड़ रहे हैं हम?
ज्वलंत से इस मौसम में मैंने अपने देश और देशवासियों के बारे में बहुत कुछ देखा और समझा.
लालू यादव जब आन्दोलन का विरोध करते हैं और "मैं अन्ना हूँ" बोलने से इनकार करते हैं, तो हमें समझ आता है. इसमें उनकी सच्चाई झलकती है. लेकिन जब बाकी का पूरा राष्ट्र खुद को अन्ना बताता है तो इसमें दोगलापन झलकता है. मौकापरस्ती झलकती है, कौंग्रेस सरकार की कमजोरी और अन्ना की ताकत झलकती है.
अनशन और आन्दोलन के उस ख़ुशमिज़ाज़ मौसम में खुद को भ्रष्टाचार विरोधी साबित करने के लिए बस तीन चीज़ें चाहिए थीं - एक मोटर-साइकिल, एक तिरंगा और कुछ खाली समय. ऐसी लहर चल रही थी कि मधु कोड़ा भी कहीं मोटर-साइकिल चलाते पाए जा सकते थे.
