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October 25, 2011

दुनिया दीवानी दिवाली की..!!


असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

अभी बैठा बैठा कुछ विचार मंथन कर रहा था. दिवाली क्यूँ हम सब को एक समान आनन्दित करता है, समाज के हर तपके में रचा बसा और हर कोई इसका दीवाना है. दिवाली को नहीं पसंद करने वालो में सिर्फ वो गाय, बकरियाँ और कुत्ते ही क्यूँ होते हैं जिन्हें शायद ये पर्व मानव जाति की उनके खिलाफ कोई शाज़िश लगती है.

इस त्योहार ने मुझे भी हमेशा से सबसे ज्यादा आकर्षित किया है.  भारत में पर्व-त्योहार तो बहुतेरे हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति पर जो पैठ दिवाली ने बनायीं है वो अतुल्य है.  देश में हर क्षेत्र में और हर भाषा के महा-पर्व हैं.  छठ, दुर्गा-पूजा, गणेश चतुर्थी से लेकर पोंगल/ओणम तक सभी अपनी अपनी गली के शेर हैं.  लेकिन फिर भी दिवाली को इतने वृहद् पैमाने पर पूरे जनमानस में पसंद किया जाना हमेशा से एक सवाल रहा है मेरे लिए.

चलिए देखा जाये कि दिवाली से किस किस का सीधा सरोकार है.
उल्लास का ये पर्व दारु पीने वालो को भी उतनी ही ख़ुशी देता है, जितना कि नहीं पीने वालो को.  खरीदने वालो को भी उतना ही आनंद देता है जितना की बेचने वालो को.  हारो या जीतो, लेकिन जुआ खेलने के लिए आधिकारिक लाइसेंस दे देता है.
और सबसे बड़ी बात- जगमगाते दियों को देखकर कविता लिखने वाले कलाकार टाइप के लोगों के लिए भी दिवाली उतना ही बड़ा अवसर है, जितना की बमबारी करने वाले आतंकवादी टाइप के लोगों के लिए.  मतलब कि इस राष्ट्रीय पर्व में सबके लिए कुछ न कुछ है- बच्चे, बड़े, लड़के, लड़कियां, खरीददार, दुकानदार, शराबी, जुआरी, कवि या आतंकवादी. 

अब भला इतने बड़े प्रभाव क्षेत्र वाला कोई पर्व सुपर-हिट कैसे नहीं होगा!

दीपावली की पौराणिक मान्यताएं भी इसको एक मज़बूत आधार देता है.  श्री राम का अयोध्या आगमन हो, कृष्ण का नरकासुर वध, समुद्र-मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी का आविर्भाव, शिव और काली का मिलन या वामन अवतार के प्रसंग हो, दिवाली के धार्मिक उदभव में हर देवी-देवता का रोल है.  अर्थात आप किसी भी देवी-देवता के अनुयायी हों, दिवाली के प्रति आपकी आस्था तो बन ही जाती है.

यदि आप मान्यताओं के बजाये वास्तविक इतिहास को महत्व देते हैं तो भी आपके पास पर्याप्त कारण है दिवाली के मुरीद होने का.  इसी दिन राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ और एक नया सम्वत चलाने का निर्णय हुआ.  महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी इसी एतिहासिक दिन हुआ.  इतना ही नहीं, दिवाली के कुछ मुग़ल कालीन सेकुलर एंगल भी हैं जो इसके वोट बैंक को और बढाता है.

और अब कुछ दलील तर्कबाजों के लिए.
दिवाली में घरो की सफाई और रंगाई-पुताई त्योहार का सबसे अहम् हिस्सा है.  वर्षा ऋतु से उत्पन्न गन्दगी और कीटाणु इस रंग-रोगन, सफाई और आगजनी से पूर्णतयः नष्ट हो जाते हैं.  ये वैज्ञानिक पहलू उन चंद लोगों के लिए है जिनके लिए पौराणिक या एतिहासिक मान्यताएं काफी नहीं हैं किसी पर्व को मनाने के लिए.

इस पावन पर्व से हर किसी का आनंद, उल्लास और सरोकार होने के और भी आयाम हैं.  दिवाली की दीवानगी के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो है हमारा स्वार्थ.  आर्थिक फायदा, और बाज़ार का फायदा.  मेरे दर्शाए ये सारे पौराणिक, धार्मिक, एतिहासिक या वैज्ञानिक कारण कल को हमें यदि ना भी याद रहे, तो भी दिवाली चमकता रहेगा.  साल दर साल बढ़ता रहेगा. फलता फूलता रहेगा.  क्यूंकि यही एक पर्व है जो हमारे पूंजीवादी ढाँचे को चारा देता है.  बाज़ार की आग को हवा देता है.

भले ही इतिहास और पुराणों में अनेकों कारणों से मनाया गया हो, लेकिन सही मायनों में तो आज ये पर्व एक जश्न है बाज़ार में पैसों के आने का.  किसानों के फसल कट गए, हाथ में पैसे आ गए.  आपको नौकरी में ढेरो बोनस मिले.  घर में काम करने वाली को भी आपने पैसे दिए.  किसी ने ये खरीदा, किसी ने वो.  किसी ने कपड़े, किसी ने मिठाईयां.  किसी ने दारु पिया, किसी ने जुआ खेला.  और ये त्योहार सुपरहिट हो गया.

आप भी एक बार सोचिये, क्या है जो दिवाली को हिट बनाता है और लोगों को इसका दीवाना बनाता है?  धर्म, आस्था, परम्परा या बाज़ार??  आप क्या समझते हैं???

मुझे तो यही समझ में आया कि दिवाली में जितना योगदान दियों का है, उतना ही अमावस्या का भी!!
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