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March 25, 2011

एक थी साईकिल..

सातवीं क्लास में पढ़ते थे हम.  आज भी याद है.  शनिवार की शाम थी.  पापा की छुट्टी का दिन, जब मेरी नयी साईकिल घर आई थी.  BSA SLR, 18 इंच!


शाम को माँ के कहने पर थोड़ी देर के लिए किताब खोल कर बैठ गए, क्यूंकि इसी शर्त पर तो साईकिल खरीदी गयी थी.  लेकिन, किताब के पन्नो पर भी मुझे मेरी नव अर्जित संपत्ति ही दिख रही थी.  आश्चर्य लग रहा था कि कैसे माँ-पापा साईकिल छोड़ दीन-दुनिया की बातें कर रहे थे.  कैसे TV पर कुछ अलग नहीं हो रहा था, और कैसे हर रात की तरह आज भी खाना खा, दूध पीकर मुझे सो जाना था.  असल में, मेरे लिए तो सब बदला बदला सा था.  दुनिया रंगीन लग रही थी, मानो जीवनसाथी मिल गया हो.

रात भर हम यही सोचते रहे कि कब सुबह हो और अपनी नयी दुल्हन को दिन के उजाले में देखें.  इंतज़ार करना कठिन होता जा रहा था.  इतना कि आँख लगी तो सपने में ही साईकिल चलाने लग गए.  नए मेहमान के लिए ऐसा शौक-ए-दीदार कि रात ढाई बजे ही नींद भी खुल गयी.  और अगले आधे घंटे प्राणप्रिये के दर्शन में ही बीत गए, सुबह की योजना बनाते बनाते.

तभी कमरे से आवाज़ आई, "अनुपम!" और माँ से डांट पड़ गयी.  मन मार, दिल पर पत्थर रख हम  वापस सो गए.

ये तो मेरा अपना
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