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May 29, 2011

सिनेमा का सफ़र और भावनाओं का बाज़ार

गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं.  शाम का समय.  कॉलोनी के सारे बच्चे खेल-कूद हो-हल्ला कर रहे थे.  छोटे, बड़े, हर उम्र के.  लड़कियाँ झुण्ड बनाकर गपशप हाँक रहीं थी.  कुछ आँटी जी अपने दरवाजों से ही बच्चों पर निगाह रखे हुए शाम के चहल पहल का आनंद ले रही थीं.  कहीं शोरगुल, ठहाके, कहीं बच्चों के रोने की आवाज़, तो कहीं बच्चों के माँ की पुकार या चिकार.

लेकिन तभी खेलते खेलते माहौल कुछ बदल सा गया.  मुझे आभास हुआ की सारी चहलकदमी ख़त्म हो गयी.  सबके सब एकदम से गायब हो गए, अपने घरों में.  मई का महीना और शाम के पाँच बजे एकाएक इलाके में सन्नाटा पसर गया.  मेरी बालक बुद्धि पूरी कोशिश करके भी मामला समझ नहीं पा रही थी.  माजरा तब जाकर समझ आया जब मेरे एक दोस्त ने बड़े आश्चर्य से पूछ डाला, "पिक्चर नहीं देखना है क्या?" और वो खुद भागता हुआ अपने घर घुस गया.

मुझे पता नहीं था कि आज सन्डे है और दूरदर्शन पर साप्ताहिक सिनेमा आने वाला था.  वो भी फ़ारूख शेख़ और रेखा की "बीवी हो तो ऐसी."  मूवीज़ में बहुत कम रुची थी मेरी.  इसलिए अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठा और  सामाजिक तौर पर बहिष्कृत सा फील करने लगा.

आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला.  इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी.  मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.

ऐसा होता था सिनेमा का क्रेज़ तब.  एक फिल्म देखने के लिए सात दिनों का इंतज़ार किसी भी मूवी को मदर इंडिया और शोले के टक्कर का बना देता था.  टीवी का मतलब ही दूरदर्शन होता था.  आज तो

March 25, 2011

एक थी साईकिल..

सातवीं क्लास में पढ़ते थे हम.  आज भी याद है.  शनिवार की शाम थी.  पापा की छुट्टी का दिन, जब मेरी नयी साईकिल घर आई थी.  BSA SLR, 18 इंच!


शाम को माँ के कहने पर थोड़ी देर के लिए किताब खोल कर बैठ गए, क्यूंकि इसी शर्त पर तो साईकिल खरीदी गयी थी.  लेकिन, किताब के पन्नो पर भी मुझे मेरी नव अर्जित संपत्ति ही दिख रही थी.  आश्चर्य लग रहा था कि कैसे माँ-पापा साईकिल छोड़ दीन-दुनिया की बातें कर रहे थे.  कैसे TV पर कुछ अलग नहीं हो रहा था, और कैसे हर रात की तरह आज भी खाना खा, दूध पीकर मुझे सो जाना था.  असल में, मेरे लिए तो सब बदला बदला सा था.  दुनिया रंगीन लग रही थी, मानो जीवनसाथी मिल गया हो.

रात भर हम यही सोचते रहे कि कब सुबह हो और अपनी नयी दुल्हन को दिन के उजाले में देखें.  इंतज़ार करना कठिन होता जा रहा था.  इतना कि आँख लगी तो सपने में ही साईकिल चलाने लग गए.  नए मेहमान के लिए ऐसा शौक-ए-दीदार कि रात ढाई बजे ही नींद भी खुल गयी.  और अगले आधे घंटे प्राणप्रिये के दर्शन में ही बीत गए, सुबह की योजना बनाते बनाते.

तभी कमरे से आवाज़ आई, "अनुपम!" और माँ से डांट पड़ गयी.  मन मार, दिल पर पत्थर रख हम  वापस सो गए.

ये तो मेरा अपना
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