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January 15, 2012

अनंत आशाएं..

बड़ी रात हो गयी है
दूर दूर शांत सा
उम्मीद के उपहास सा
घनघोर अन्धकार है


पर हृदय में कहीं
इस दृश्य से परे
अजब सी है खलबली
प्रकाश ही प्रकाश है|


इस निशा की गोद में
जहाँ चाँद भी दिखे नहीं
वियोग हो समाज में
और आस कोई है नहीं


फिर भी हर स्वप्न में
संभावना अनंत दिखे
आस का सहर नया
सूर्य की किरण दिखे|

September 11, 2011

मैं अन्ना नहीं !!

बड़े दिनों से मैं कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन आज जाकर कलम घिस पा रहा हूँव्यस्तता की दुहाई मैं नहीं दूंगाअसल में अन्ना हज़ारे ने मुझे बाँध सा लिया थाऐसा माहौल बना दिया कि भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और लिखना मेरी काबीलियत से परे हो गया थाऔर अन्ना या उनके महा-आन्दोलन पर एक आलोचक की तरह लिखना मेरी हिम्मत से परे था. इस पवित्र आन्दोलन पर कोई समीक्षा सबको नागवार गुज़रती और आप मुझे ही भ्रष्टाचारी होने का तमगा दे देते. 

ख़ैर मैंने लिखा तो कुछ नहीं, लेकिन इस सीज़न को करीब से देखने और समझने की पूरी कोशिश कीबड़ा ख़ुशगवार सा मौसम था ये.  क्यूंकि, तरह तरह के घोटालों की गूँज के बाद अब जनमानस के गूंजने की बारी आयी थी.  ये सीज़न उम्मीदों का था, लोगों की संवेदनाओं का और सरकार से सवाल का था.  फिजा में ऊर्जा थी, भाईचारा था और साथ ही भ्रष्टाचार के प्रति अथाह आक्रोश.  माहौल ऐसा कि कलमाड़ी और राजा तिहाड़ में ही ज्यादा सुरक्षित फील कर रहे थे.  यदि बाहर भी होते तो "मैं अन्ना हूँ" लिखी टोपी पहनकर घूमते.

आन्दोलन से हमें एक चिंताजनक बात ये मालूम पड़ा कि देश में हर कोई खुद को ही अन्ना बताने लगा है.  भारत के गाँव-गाँव गली-गली में आपको "अन्ना" मिल जाते.  सबके सब अन्ना, पूरा देश अन्ना बन गया!  फिर इस आन्दोलन की आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी, किस से लड़ रहे हैं हम?


ज्वलंत से इस मौसम में मैंने अपने देश और देशवासियों के बारे में बहुत कुछ देखा और समझा.
लालू यादव जब आन्दोलन का विरोध करते हैं और "मैं अन्ना हूँ" बोलने से इनकार करते हैं, तो हमें समझ आता है.  इसमें उनकी सच्चाई झलकती है.  लेकिन जब बाकी का पूरा राष्ट्र खुद को अन्ना बताता है तो इसमें दोगलापन झलकता है.  मौकापरस्ती झलकती है, कौंग्रेस सरकार की कमजोरी और अन्ना की ताकत झलकती है.



अनशन और आन्दोलन के उस ख़ुशमिज़ाज़ मौसम में खुद को भ्रष्टाचार विरोधी साबित करने के लिए बस तीन चीज़ें चाहिए थीं - एक मोटर-साइकिल, एक तिरंगा और कुछ खाली समय.  ऐसी लहर चल रही थी कि मधु कोड़ा भी कहीं मोटर-साइकिल चलाते पाए जा सकते थे.

June 21, 2011

..Knowing "WE" and our "LIFE"!!

For the first time ever for my readers, Anupam Abhivyakti has a piece not originally written by me.  However, i am as delighted while publishing this magnificent work as i have ever been.  This contemplative & powerful manifestation of Life is composed by Late Amar Nath Sawhney and is surely among one of the best to be written in its category.  Read on and ponder over what Life actually means to you.


Ah me, are we
        A bare crate,
A rudderless boat
That ever float
In world's wide ocean
Without a notion
        Of its fate
Or destiny?


Or, is it right
        That in vain
We come and go,
Without ado
Like a little cloud
That rolls about
        After rain
When sky is bright?


Or, can it be
        That our fate
Is like a bubble
In water's trouble;
Arise and grow
And simply go,
        In quick haste
To eternity?


Or, is it we
        Come and go
Without an end
To mar or mend
The vast design
And leave behind
        Signs to show
Of what we be?
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