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January 17, 2013

नागा साधुओं का रहस्य..

इलाहाबाद के संगम पर महाकुम्भ शुरू हो चुका है।  भारत के अध्यात्मिक प्रभुत्व का सबसे ज्वलंत प्रतीक, धरती पर आस्था का सबसे बड़ा मेला!  बारह साल बाद हो रहे इस वृहद् महासमागम ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।  लेकिन जिस एक पहलु ने हम सबको स्तब्ध किया है,  वो है नागा साधुओं का रहस्यमयी जीवन और उनके त्याग-समर्पण का वृहद् दर्शन


मेरा मानना है कि कम जानकारी और रहस्य किसी भी चीज़ का आकर्षण बढ़ा देता है।  नागा साधु भी हमारे आकर्षण का केंद्र रहे हैं क्यूंकि सिर्फ कुम्भ के दौरान ही ये अपनी बैरागी दुनिया से निकलकर हमारी पूँजीवादी दुनिया से रू-बरु होते हैं।  ...अरे नहीं नहीं, हम इनसे रू-बरु होते हैं; इनको भला क्या मतलब हमसे!

October 25, 2011

दुनिया दीवानी दिवाली की..!!


असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

अभी बैठा बैठा कुछ विचार मंथन कर रहा था. दिवाली क्यूँ हम सब को एक समान आनन्दित करता है, समाज के हर तपके में रचा बसा और हर कोई इसका दीवाना है. दिवाली को नहीं पसंद करने वालो में सिर्फ वो गाय, बकरियाँ और कुत्ते ही क्यूँ होते हैं जिन्हें शायद ये पर्व मानव जाति की उनके खिलाफ कोई शाज़िश लगती है.

इस त्योहार ने मुझे भी हमेशा से सबसे ज्यादा आकर्षित किया है.  भारत में पर्व-त्योहार तो बहुतेरे हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति पर जो पैठ दिवाली ने बनायीं है वो अतुल्य है.  देश में हर क्षेत्र में और हर भाषा के महा-पर्व हैं.  छठ, दुर्गा-पूजा, गणेश चतुर्थी से लेकर पोंगल/ओणम तक सभी अपनी अपनी गली के शेर हैं.  लेकिन फिर भी दिवाली को इतने वृहद् पैमाने पर पूरे जनमानस में पसंद किया जाना हमेशा से एक सवाल रहा है मेरे लिए.

चलिए देखा जाये कि दिवाली से किस किस का सीधा सरोकार है.
उल्लास का ये पर्व दारु पीने वालो को भी उतनी ही ख़ुशी देता है, जितना कि नहीं पीने वालो को.  खरीदने वालो को भी उतना ही आनंद देता है जितना की बेचने वालो को.  हारो या जीतो, लेकिन जुआ खेलने के लिए आधिकारिक लाइसेंस दे देता है.
और सबसे बड़ी बात- जगमगाते दियों को देखकर कविता लिखने वाले कलाकार टाइप के लोगों के लिए भी दिवाली उतना ही बड़ा अवसर है, जितना की बमबारी करने वाले आतंकवादी टाइप के लोगों के लिए.  मतलब कि इस राष्ट्रीय पर्व में सबके लिए कुछ न कुछ है- बच्चे, बड़े, लड़के, लड़कियां, खरीददार, दुकानदार, शराबी, जुआरी, कवि या आतंकवादी. 

अब भला इतने बड़े प्रभाव क्षेत्र वाला कोई पर्व सुपर-हिट कैसे नहीं होगा!

दीपावली की पौराणिक मान्यताएं भी इसको एक मज़बूत आधार देता है.  श्री राम का अयोध्या आगमन हो, कृष्ण का नरकासुर वध, समुद्र-मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी का आविर्भाव, शिव और काली का मिलन या वामन अवतार के प्रसंग हो, दिवाली के धार्मिक उदभव में हर देवी-देवता का रोल है.  अर्थात आप किसी भी देवी-देवता के अनुयायी हों, दिवाली के प्रति आपकी आस्था तो बन ही जाती है.

यदि आप मान्यताओं के बजाये वास्तविक इतिहास को महत्व देते हैं तो भी आपके पास पर्याप्त कारण है दिवाली के मुरीद होने का.  इसी दिन राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ और एक नया सम्वत चलाने का निर्णय हुआ.  महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी इसी एतिहासिक दिन हुआ.  इतना ही नहीं, दिवाली के कुछ मुग़ल कालीन सेकुलर एंगल भी हैं जो इसके वोट बैंक को और बढाता है.

और अब कुछ दलील तर्कबाजों के लिए.
दिवाली में घरो की सफाई और रंगाई-पुताई त्योहार का सबसे अहम् हिस्सा है.  वर्षा ऋतु से उत्पन्न गन्दगी और कीटाणु इस रंग-रोगन, सफाई और आगजनी से पूर्णतयः नष्ट हो जाते हैं.  ये वैज्ञानिक पहलू उन चंद लोगों के लिए है जिनके लिए पौराणिक या एतिहासिक मान्यताएं काफी नहीं हैं किसी पर्व को मनाने के लिए.

इस पावन पर्व से हर किसी का आनंद, उल्लास और सरोकार होने के और भी आयाम हैं.  दिवाली की दीवानगी के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो है हमारा स्वार्थ.  आर्थिक फायदा, और बाज़ार का फायदा.  मेरे दर्शाए ये सारे पौराणिक, धार्मिक, एतिहासिक या वैज्ञानिक कारण कल को हमें यदि ना भी याद रहे, तो भी दिवाली चमकता रहेगा.  साल दर साल बढ़ता रहेगा. फलता फूलता रहेगा.  क्यूंकि यही एक पर्व है जो हमारे पूंजीवादी ढाँचे को चारा देता है.  बाज़ार की आग को हवा देता है.

भले ही इतिहास और पुराणों में अनेकों कारणों से मनाया गया हो, लेकिन सही मायनों में तो आज ये पर्व एक जश्न है बाज़ार में पैसों के आने का.  किसानों के फसल कट गए, हाथ में पैसे आ गए.  आपको नौकरी में ढेरो बोनस मिले.  घर में काम करने वाली को भी आपने पैसे दिए.  किसी ने ये खरीदा, किसी ने वो.  किसी ने कपड़े, किसी ने मिठाईयां.  किसी ने दारु पिया, किसी ने जुआ खेला.  और ये त्योहार सुपरहिट हो गया.

आप भी एक बार सोचिये, क्या है जो दिवाली को हिट बनाता है और लोगों को इसका दीवाना बनाता है?  धर्म, आस्था, परम्परा या बाज़ार??  आप क्या समझते हैं???

मुझे तो यही समझ में आया कि दिवाली में जितना योगदान दियों का है, उतना ही अमावस्या का भी!!

May 29, 2011

सिनेमा का सफ़र और भावनाओं का बाज़ार

गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं.  शाम का समय.  कॉलोनी के सारे बच्चे खेल-कूद हो-हल्ला कर रहे थे.  छोटे, बड़े, हर उम्र के.  लड़कियाँ झुण्ड बनाकर गपशप हाँक रहीं थी.  कुछ आँटी जी अपने दरवाजों से ही बच्चों पर निगाह रखे हुए शाम के चहल पहल का आनंद ले रही थीं.  कहीं शोरगुल, ठहाके, कहीं बच्चों के रोने की आवाज़, तो कहीं बच्चों के माँ की पुकार या चिकार.

लेकिन तभी खेलते खेलते माहौल कुछ बदल सा गया.  मुझे आभास हुआ की सारी चहलकदमी ख़त्म हो गयी.  सबके सब एकदम से गायब हो गए, अपने घरों में.  मई का महीना और शाम के पाँच बजे एकाएक इलाके में सन्नाटा पसर गया.  मेरी बालक बुद्धि पूरी कोशिश करके भी मामला समझ नहीं पा रही थी.  माजरा तब जाकर समझ आया जब मेरे एक दोस्त ने बड़े आश्चर्य से पूछ डाला, "पिक्चर नहीं देखना है क्या?" और वो खुद भागता हुआ अपने घर घुस गया.

मुझे पता नहीं था कि आज सन्डे है और दूरदर्शन पर साप्ताहिक सिनेमा आने वाला था.  वो भी फ़ारूख शेख़ और रेखा की "बीवी हो तो ऐसी."  मूवीज़ में बहुत कम रुची थी मेरी.  इसलिए अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठा और  सामाजिक तौर पर बहिष्कृत सा फील करने लगा.

आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला.  इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी.  मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.

ऐसा होता था सिनेमा का क्रेज़ तब.  एक फिल्म देखने के लिए सात दिनों का इंतज़ार किसी भी मूवी को मदर इंडिया और शोले के टक्कर का बना देता था.  टीवी का मतलब ही दूरदर्शन होता था.  आज तो

April 18, 2011

मृगतृष्णा

मेरे हर पल अब हैं तुम्हारे
क्या तुम्हारी साँसों पर भी है मेरा नाम
या हम उस फूल की मात्र खुशबू तो नहीं
जो मसलते हाथों को सुगन्धित करे, घायल नहीं


क्या हो तुम वो बहता निर्मल झरना
एक रहस्य, या मेरा आईना
या बस बढ़ाती हो इन बहारों की सुन्दरता
बनकर मेरे नैनों की मृगतृष्णा


अरी मृगतृष्णा, तुम तो मेरी आँखों का छल हो
पर हृदय कहे तुम मेरी हरदम हरपल हो
जिसमें मैं मदहोश होकर डूबा हूँ
उस झील में खिला तुम कँवल हो


क्या हो तुम वो चाँद चकोरी
जो करती है आँखों की प्यास पूरी
पर मेरा कभी हो नहीं सकता
रह जाती हैं मेरी हसरतें अधूरी


क्या सही है तुम पर मेरी दावेदारी
या हो बस एक कल्पना कोरी
क्या कहीं है ऐसी कोई डोरी
जो जोड़ने की हो कड़ी हमारी


तुम मेरी ताकत हो या कमजोरी
मेरे नज़दीक हो, या है मुझसे दूरी
मेरे हैं ऐसे कुछ सवाल
जवाब सारे तुम करोगी पूरी..

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