गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं. शाम का समय. कॉलोनी के सारे बच्चे खेल-कूद हो-हल्ला कर रहे थे. छोटे, बड़े, हर उम्र के. लड़कियाँ झुण्ड बनाकर गपशप हाँक रहीं थी. कुछ आँटी जी अपने दरवाजों से ही बच्चों पर निगाह रखे हुए शाम के चहल पहल का आनंद ले रही थीं. कहीं शोरगुल, ठहाके, कहीं बच्चों के रोने की आवाज़, तो कहीं बच्चों के माँ की पुकार या चिकार.
लेकिन तभी खेलते खेलते माहौल कुछ बदल सा गया. मुझे आभास हुआ की सारी चहलकदमी ख़त्म हो गयी. सबके सब एकदम से गायब हो गए, अपने घरों में. मई का महीना और शाम के पाँच बजे एकाएक इलाके में सन्नाटा पसर गया. मेरी बालक बुद्धि पूरी कोशिश करके भी मामला समझ नहीं पा रही थी. माजरा तब जाकर समझ आया जब मेरे एक दोस्त ने बड़े आश्चर्य से पूछ डाला, "पिक्चर नहीं देखना है क्या?" और वो खुद भागता हुआ अपने घर घुस गया.
मुझे पता नहीं था कि आज सन्डे है और दूरदर्शन पर साप्ताहिक सिनेमा आने वाला था. वो भी फ़ारूख शेख़ और रेखा की "बीवी हो तो ऐसी." मूवीज़ में बहुत कम रुची थी मेरी. इसलिए अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठा और सामाजिक तौर पर बहिष्कृत सा फील करने लगा.
आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला. इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी. मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.
आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला. इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी. मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.
ऐसा होता था सिनेमा का क्रेज़ तब. एक फिल्म देखने के लिए सात दिनों का इंतज़ार किसी भी मूवी को मदर इंडिया और शोले के टक्कर का बना देता था. टीवी का मतलब ही दूरदर्शन होता था. आज तो