April 18, 2011

मृगतृष्णा

मेरे हर पल अब हैं तुम्हारे
क्या तुम्हारी साँसों पर भी है मेरा नाम
या हम उस फूल की मात्र खुशबू तो नहीं
जो मसलते हाथों को सुगन्धित करे, घायल नहीं


क्या हो तुम वो बहता निर्मल झरना
एक रहस्य, या मेरा आईना
या बस बढ़ाती हो इन बहारों की सुन्दरता
बनकर मेरे नैनों की मृगतृष्णा


अरी मृगतृष्णा, तुम तो मेरी आँखों का छल हो
पर हृदय कहे तुम मेरी हरदम हरपल हो
जिसमें मैं मदहोश होकर डूबा हूँ
उस झील में खिला तुम कँवल हो


क्या हो तुम वो चाँद चकोरी
जो करती है आँखों की प्यास पूरी
पर मेरा कभी हो नहीं सकता
रह जाती हैं मेरी हसरतें अधूरी


क्या सही है तुम पर मेरी दावेदारी
या हो बस एक कल्पना कोरी
क्या कहीं है ऐसी कोई डोरी
जो जोड़ने की हो कड़ी हमारी


तुम मेरी ताकत हो या कमजोरी
मेरे नज़दीक हो, या है मुझसे दूरी
मेरे हैं ऐसे कुछ सवाल
जवाब सारे तुम करोगी पूरी..

4 comments:

  1. शब्दमय रचना का पाठ कर मैं शब्दहीन हो गया हूँ|
    बहुत ही रोमानी कविता है|
    काबिलेतारीफ.........

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  2. नमस्ते सर.

    अच्छा लगता है ये सोचकर की आपने हमारे कॉलेज से ही पढाई की है.

    मेरी एक फ्रेंड है, पल्लवी. आपकी ब्लॉग के बारे में सुना है उस से. आज पहली बार खुद पढ़ रही हूँ.

    बहुत सुन्दर लिखते हो आप. मैं कामना करुँगी की आपकी कलम की ताकत दिन प्रतिदिन बढती रहे.

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  3. ऐसी तृष्णा क्या करोगे तुम
    जो तुम्हे प्यासा भी न रक्खे
    कुछ सवाल रहने दो अधूरे
    कुछ बातें रहने दो अनकही
    न हर पल ढूंढते रहो उसकी बातों में जवाब तुम

    गर देना ही होता तुम्हे जवाब
    तो शब्दों की क्या कमी थी
    तुम्हारी यह मृगतृष्णा
    न हो कर भी, तुम्हारी रहेगी सदा

    खुशबू ही सही
    पर तुम्हारी साँसों में बसेगी
    नजारों में सही
    तुम्हारे नयनो में रहेगी

    चकोरी ही सही
    पर चाँद का एहसास बन रहेगी
    कल्पना ही सही
    पर तुम्हारे मन में रहेगी
    दूर है सही
    पर कमजोरी नहीं
    तुम्हारी ताक़त बन रहेगी !

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