April 7, 2011

मोहाली महोत्सव !!

मोहाली के फेज़ 1 मार्केट में बैठे थे हम जब इंग्लैंड से आये एक फिरंगी जोड़े से बात हुई.  परेशान से दिख रहे दंपत्ति पानी की बोतल लेने आये थे.  "People are crazy here!! There is such a long queue at the stadium... Horrible!!", झुंझलाई हुई लड़की बड़बड़ाने लगी.  वो कहने लगे कि उनके यहाँ तो टिकेट्स ऑनलाइन बुक कर लेते हैं और मजे से बीयर पीते हुए मैच देखते हैं.

मेरे साथ बैठे लोग मुस्कुराने लगे.  फिर उनको बताया कि यहाँ काउंटर से भी टिकट खरीदने पर गारंटी नहीं कि आप स्टेडियम में घुस जाएँ.  बेचारों के चेहरे का रंग उड़ गया और वो होर्रिबल, टेर्रिबल करते करते वहाँ से चले गए.

वैसे मैच का टिकट मिल पाना तो सही में मुश्किल था.  इतना कि रजनीकांत को भी दो ही टिकट मिल पाए!  मैंने तो कोशिश भी नहीं की.  खुद खेलने में जो मज़ा है वो मैदान के बाहर दर्शक दीर्घा से कभी नहीं आया मुझे.  स्टेडियम तो नहीं गया  लेकिन पूरा चंडीगढ़ किसी भी स्टेडियम से कम ज्वलंत नहीं लग रहा था.

मैच के दौरान हर भारतीय को मुख्यतः तीन प्रजातियों में बाँटा जा सकता था.  एक,  जो टीवी पर या स्टेडियम में क्रिकेट का लुत्फ़ उठा रहे थे.  दुसरे जो सड़कों पर, गाड़ियों में आवागमन कर रहे वो लोग जो कहीं न कहीं अपने घर या दोस्तों के पास मैच देखने जा रहे थे.  और तीसरी प्रजाति जो फोन पर लगी थी, अपने किसी सूत्र से स्कोर अपडेट लेते हुए.  मतलब की देश के सामने एक ही अजेंडा था- क्रिकेट!  बिजनेसमैन हो, कर्मचारी, अधिकारी, नेता, गृहणी या छात्र.  सबके मन में एक ही सवाल कि भारत जीतेगा या नहीं?  क्या सचिन शतक बना लेगा??
तेंदुलकर के रनों को हर देशवासी अपनी संपत्ति समझता है.  जितनी बढे, हम उतने खुश!  ये सवाल मेरे मन में अक्सर गूंजता है कि सचिन और क्रिकेट में किसका, किसपर, कितना प्रभाव रहा है.  ख़ैर, सचिन पर विस्तार से चर्चा किसी और लेख में करेंगे.  अभी तो अपने सहवाग मिसाइल से हताहत लोगों की बात करते हैं.
सहवाग ने जब उमर गुल के एक ओवर में 5 चौके लगाये तो पकिस्तान में 3 लोगों की दिल की धड़कन रुकने से और 2 की ख़ुदकुशी से जान चली गयी.  हमारा सलामी बल्लेबाज़ किसी भी अग्नि, पृथ्वी या ग़ज़नी से ज्यादा मारक क्षमता का निकला.  पाकिस्तान के कुछ लोग तो सहवाग पर गैर-इरादतन हत्या का केस बनाने की सोच रहे हैं.  यहाँ तक कि पाकिस्तानियों को तो ब्रोडकासटर्स से भी शिकायत होनी चाहिये.  मैच शुरू होने से पहले कमज़ोर दिल वालों को हिदायती चेतावनी जो नहीं दी गयी.

इधर खेल के दौरान जब मिस्बाह का विकेट गिरा और भारत 29 रनों से विजयी  हुआ तो देश एक अविस्मरणीये क्षण का गवाह बन रहा था.  पाकिस्तान को वागाह बोर्डर का रास्ता दिखाते ही लोग पागल हो उठे.  हर तरफ आतिशबाज़ियाँ  होने लगी.  ऐसे उन्माद में कुछ लोगों को समझ ही नहीं आ रहा था कि दायें जाएँ या बायें.  तो अलबला के चिल्लाने लगे.  इतनी ट्रैफिक चंडीगढ़ मोहाली के सड़कों पर कभी नहीं हुई.  गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ.  और हर गाड़ीवाला एक दुसरे का चिल्ला कर अभिवादन करता.  लग रहा था जैसे देश अभी आज़ाद हुआ हो.  पंजाब पुलिस  और  चंडीगढ़  पुलिस इतनी  असहाय  कभी  नहीं  दिखी  मुझे.


ढोल-नगाड़े, रंग-गुलाल भी आ गए.  होली और दिवाली के  समावेश ने माहौल को करिश्माई बना दिया.  इस जादुई क्षण की एक बानगी भर देखिये.  मुझे पता चला कि कुछ घंटो पहले ही वहाँ दो लोगों में खूब लड़ाई हुई थी.  अभी दोनों जोड़ी बनाकर भांगड़ा कर रहे थे.  भीड़ में किसी की भी किसीसे  नज़र मिली तो गले लगाकर बधाई दी जाती.  हर किसी में सिर्फ एक समानता, सिर्फ एक पहचान थी जो लोगों को इस कदर उन्मादी बना रहा था- भारतीयता!

मैच देखते वक़्त तो फिर भी प्रजातियाँ तीन थी- अलग अलग तरीकों से क्रिकेट से जुडी हुई.  जीत के बाद इन तीनो का विलय हो जाता है, और सिर्फ एक जाति उभर के सामने आती है- राष्ट्रीयता!

रात परवान चढ़ता गया.  लोग डूबे रहे, दीन-दुनिया से बेखबर, मदमस्त- क्रिकेट के नशे में, देश के रंग में.  सवाल ये है कि क्या भारतीयता का रंग जगाने के लिए हर बार हमें किसी क्रिकेट मैच का ही इंतज़ार करना पड़ेगा..??

4 comments:

  1. bahut sahi likha hai. India Vs Pakistan match ke din ye samajh mein nahi aa raha tha ki 'Bhartiyata' zyada mahatavpuran ho gayi hai ya 'balle ka khumaar' sar chadh kar bol raha hai. lekin jo bhi ho chandigarh ki sadkein itni shaandar aur dostana pehle kabhi nahi lagi jitni ki us Vijay ki raat. har koi har kisi ka dost thaa........itna nasha toh final jeetne ke baad bhi nahi dikha.....bahut din ke baad sadkon par aaj ki peedhi ke naujawanon ko 'Bharat Mata ki Jai' ka naara lagaate suna.....pehli baar cricket ka 50 over ka game saarthak lagaa...... badhaai ho!

    ReplyDelete
  2. Yet another masterpiece!
    Being very close myself, i'm proud of the fact that you are an Allahabadi.
    Keep writing and keep giving me an opportunity to be with you at least through your blog.

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सही कहा है|
    दुख की बात यही है की हमे राष्ट्रीयता के रंग में रंगने के लिए क्रिकेट का सहारा लेना परता है|
    हम ह्रदय से "एक" अर्थात "राष्ट्रीय" रंग में हमेशा क्यूँ नहीं रह पाते है|
    साल के हर एक पल एक दुसरे के लिए होली और दिवाली जैसी खुशियाँ दिल में क्यूँ नहीं रख पाते है जो ३० मार्च
    के रात को था|
    काश! वो दिन भी आये|

    ReplyDelete
  4. Sanjukta ji, Anupam alahabadi nahi hai BIHARI hai.
    Logon ko batao Anupam. Sab tumhein apne hi ghar ka samajhne lagte hain.

    ReplyDelete

Don't be Shy, Leave a Reply!
..& Contribute to the divine process of Thought Sharing.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...