November 20, 2011

तेरा आना..



 नशीली आँख में बादल का छाना
तेरा आना है
अकेली रात में नींदें उड़ाना
तेरा आना है!

जो हम ख़्वाबों से भी फ़क़त इश्क कर बैठे
वो सपनो की स्याही से लिपटकर तेरा आना है!

मेरी हर बात में
एहसास में
हर सांस में ख़ुशबू
हरेक अलफ़ाज़ में जादू 
मेरी वो चाल बेकाबू हो जाना
तेरा आना है!!

October 25, 2011

दुनिया दीवानी दिवाली की..!!


असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

अभी बैठा बैठा कुछ विचार मंथन कर रहा था. दिवाली क्यूँ हम सब को एक समान आनन्दित करता है, समाज के हर तपके में रचा बसा और हर कोई इसका दीवाना है. दिवाली को नहीं पसंद करने वालो में सिर्फ वो गाय, बकरियाँ और कुत्ते ही क्यूँ होते हैं जिन्हें शायद ये पर्व मानव जाति की उनके खिलाफ कोई शाज़िश लगती है.

इस त्योहार ने मुझे भी हमेशा से सबसे ज्यादा आकर्षित किया है.  भारत में पर्व-त्योहार तो बहुतेरे हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति पर जो पैठ दिवाली ने बनायीं है वो अतुल्य है.  देश में हर क्षेत्र में और हर भाषा के महा-पर्व हैं.  छठ, दुर्गा-पूजा, गणेश चतुर्थी से लेकर पोंगल/ओणम तक सभी अपनी अपनी गली के शेर हैं.  लेकिन फिर भी दिवाली को इतने वृहद् पैमाने पर पूरे जनमानस में पसंद किया जाना हमेशा से एक सवाल रहा है मेरे लिए.

चलिए देखा जाये कि दिवाली से किस किस का सीधा सरोकार है.
उल्लास का ये पर्व दारु पीने वालो को भी उतनी ही ख़ुशी देता है, जितना कि नहीं पीने वालो को.  खरीदने वालो को भी उतना ही आनंद देता है जितना की बेचने वालो को.  हारो या जीतो, लेकिन जुआ खेलने के लिए आधिकारिक लाइसेंस दे देता है.
और सबसे बड़ी बात- जगमगाते दियों को देखकर कविता लिखने वाले कलाकार टाइप के लोगों के लिए भी दिवाली उतना ही बड़ा अवसर है, जितना की बमबारी करने वाले आतंकवादी टाइप के लोगों के लिए.  मतलब कि इस राष्ट्रीय पर्व में सबके लिए कुछ न कुछ है- बच्चे, बड़े, लड़के, लड़कियां, खरीददार, दुकानदार, शराबी, जुआरी, कवि या आतंकवादी. 

अब भला इतने बड़े प्रभाव क्षेत्र वाला कोई पर्व सुपर-हिट कैसे नहीं होगा!

दीपावली की पौराणिक मान्यताएं भी इसको एक मज़बूत आधार देता है.  श्री राम का अयोध्या आगमन हो, कृष्ण का नरकासुर वध, समुद्र-मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी का आविर्भाव, शिव और काली का मिलन या वामन अवतार के प्रसंग हो, दिवाली के धार्मिक उदभव में हर देवी-देवता का रोल है.  अर्थात आप किसी भी देवी-देवता के अनुयायी हों, दिवाली के प्रति आपकी आस्था तो बन ही जाती है.

यदि आप मान्यताओं के बजाये वास्तविक इतिहास को महत्व देते हैं तो भी आपके पास पर्याप्त कारण है दिवाली के मुरीद होने का.  इसी दिन राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ और एक नया सम्वत चलाने का निर्णय हुआ.  महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी इसी एतिहासिक दिन हुआ.  इतना ही नहीं, दिवाली के कुछ मुग़ल कालीन सेकुलर एंगल भी हैं जो इसके वोट बैंक को और बढाता है.

और अब कुछ दलील तर्कबाजों के लिए.
दिवाली में घरो की सफाई और रंगाई-पुताई त्योहार का सबसे अहम् हिस्सा है.  वर्षा ऋतु से उत्पन्न गन्दगी और कीटाणु इस रंग-रोगन, सफाई और आगजनी से पूर्णतयः नष्ट हो जाते हैं.  ये वैज्ञानिक पहलू उन चंद लोगों के लिए है जिनके लिए पौराणिक या एतिहासिक मान्यताएं काफी नहीं हैं किसी पर्व को मनाने के लिए.

इस पावन पर्व से हर किसी का आनंद, उल्लास और सरोकार होने के और भी आयाम हैं.  दिवाली की दीवानगी के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो है हमारा स्वार्थ.  आर्थिक फायदा, और बाज़ार का फायदा.  मेरे दर्शाए ये सारे पौराणिक, धार्मिक, एतिहासिक या वैज्ञानिक कारण कल को हमें यदि ना भी याद रहे, तो भी दिवाली चमकता रहेगा.  साल दर साल बढ़ता रहेगा. फलता फूलता रहेगा.  क्यूंकि यही एक पर्व है जो हमारे पूंजीवादी ढाँचे को चारा देता है.  बाज़ार की आग को हवा देता है.

भले ही इतिहास और पुराणों में अनेकों कारणों से मनाया गया हो, लेकिन सही मायनों में तो आज ये पर्व एक जश्न है बाज़ार में पैसों के आने का.  किसानों के फसल कट गए, हाथ में पैसे आ गए.  आपको नौकरी में ढेरो बोनस मिले.  घर में काम करने वाली को भी आपने पैसे दिए.  किसी ने ये खरीदा, किसी ने वो.  किसी ने कपड़े, किसी ने मिठाईयां.  किसी ने दारु पिया, किसी ने जुआ खेला.  और ये त्योहार सुपरहिट हो गया.

आप भी एक बार सोचिये, क्या है जो दिवाली को हिट बनाता है और लोगों को इसका दीवाना बनाता है?  धर्म, आस्था, परम्परा या बाज़ार??  आप क्या समझते हैं???

मुझे तो यही समझ में आया कि दिवाली में जितना योगदान दियों का है, उतना ही अमावस्या का भी!!

September 11, 2011

मैं अन्ना नहीं !!

बड़े दिनों से मैं कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन आज जाकर कलम घिस पा रहा हूँव्यस्तता की दुहाई मैं नहीं दूंगाअसल में अन्ना हज़ारे ने मुझे बाँध सा लिया थाऐसा माहौल बना दिया कि भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और लिखना मेरी काबीलियत से परे हो गया थाऔर अन्ना या उनके महा-आन्दोलन पर एक आलोचक की तरह लिखना मेरी हिम्मत से परे था. इस पवित्र आन्दोलन पर कोई समीक्षा सबको नागवार गुज़रती और आप मुझे ही भ्रष्टाचारी होने का तमगा दे देते. 

ख़ैर मैंने लिखा तो कुछ नहीं, लेकिन इस सीज़न को करीब से देखने और समझने की पूरी कोशिश कीबड़ा ख़ुशगवार सा मौसम था ये.  क्यूंकि, तरह तरह के घोटालों की गूँज के बाद अब जनमानस के गूंजने की बारी आयी थी.  ये सीज़न उम्मीदों का था, लोगों की संवेदनाओं का और सरकार से सवाल का था.  फिजा में ऊर्जा थी, भाईचारा था और साथ ही भ्रष्टाचार के प्रति अथाह आक्रोश.  माहौल ऐसा कि कलमाड़ी और राजा तिहाड़ में ही ज्यादा सुरक्षित फील कर रहे थे.  यदि बाहर भी होते तो "मैं अन्ना हूँ" लिखी टोपी पहनकर घूमते.

आन्दोलन से हमें एक चिंताजनक बात ये मालूम पड़ा कि देश में हर कोई खुद को ही अन्ना बताने लगा है.  भारत के गाँव-गाँव गली-गली में आपको "अन्ना" मिल जाते.  सबके सब अन्ना, पूरा देश अन्ना बन गया!  फिर इस आन्दोलन की आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी, किस से लड़ रहे हैं हम?


ज्वलंत से इस मौसम में मैंने अपने देश और देशवासियों के बारे में बहुत कुछ देखा और समझा.
लालू यादव जब आन्दोलन का विरोध करते हैं और "मैं अन्ना हूँ" बोलने से इनकार करते हैं, तो हमें समझ आता है.  इसमें उनकी सच्चाई झलकती है.  लेकिन जब बाकी का पूरा राष्ट्र खुद को अन्ना बताता है तो इसमें दोगलापन झलकता है.  मौकापरस्ती झलकती है, कौंग्रेस सरकार की कमजोरी और अन्ना की ताकत झलकती है.



अनशन और आन्दोलन के उस ख़ुशमिज़ाज़ मौसम में खुद को भ्रष्टाचार विरोधी साबित करने के लिए बस तीन चीज़ें चाहिए थीं - एक मोटर-साइकिल, एक तिरंगा और कुछ खाली समय.  ऐसी लहर चल रही थी कि मधु कोड़ा भी कहीं मोटर-साइकिल चलाते पाए जा सकते थे.

June 21, 2011

..Knowing "WE" and our "LIFE"!!

For the first time ever for my readers, Anupam Abhivyakti has a piece not originally written by me.  However, i am as delighted while publishing this magnificent work as i have ever been.  This contemplative & powerful manifestation of Life is composed by Late Amar Nath Sawhney and is surely among one of the best to be written in its category.  Read on and ponder over what Life actually means to you.


Ah me, are we
        A bare crate,
A rudderless boat
That ever float
In world's wide ocean
Without a notion
        Of its fate
Or destiny?


Or, is it right
        That in vain
We come and go,
Without ado
Like a little cloud
That rolls about
        After rain
When sky is bright?


Or, can it be
        That our fate
Is like a bubble
In water's trouble;
Arise and grow
And simply go,
        In quick haste
To eternity?


Or, is it we
        Come and go
Without an end
To mar or mend
The vast design
And leave behind
        Signs to show
Of what we be?

June 15, 2011

Power of Photography

In 1993, a little known South African photographer visited a famine stricken Sudan to cover the civil war there. The disturbing scenes of despair could be seen all around. People were madly scurrying for eatables brought by UN agencies. The race to the feeding camps was so intense that men and women, leaving there fledgling kids on ground, ran, lest they be left behind.

The photographer, in the mean time was moving around looking for and capturing the miseries of mankind. Nearly a kilometer away from the camp, he saw a starving girl child crawling towards the feeding center. As he set himself up to photograph her, a Vulture descended in the background anticipating the dying child to be a prey. Careful not to disturb the bird, the photographer positioned himself for the best possible shot. He waited for 20 minutes hoping that the predator may spread its wings for a more dramatic imagery. The Vulture, at the same time, was waiting for the child to die.

May 29, 2011

सिनेमा का सफ़र और भावनाओं का बाज़ार

गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं.  शाम का समय.  कॉलोनी के सारे बच्चे खेल-कूद हो-हल्ला कर रहे थे.  छोटे, बड़े, हर उम्र के.  लड़कियाँ झुण्ड बनाकर गपशप हाँक रहीं थी.  कुछ आँटी जी अपने दरवाजों से ही बच्चों पर निगाह रखे हुए शाम के चहल पहल का आनंद ले रही थीं.  कहीं शोरगुल, ठहाके, कहीं बच्चों के रोने की आवाज़, तो कहीं बच्चों के माँ की पुकार या चिकार.

लेकिन तभी खेलते खेलते माहौल कुछ बदल सा गया.  मुझे आभास हुआ की सारी चहलकदमी ख़त्म हो गयी.  सबके सब एकदम से गायब हो गए, अपने घरों में.  मई का महीना और शाम के पाँच बजे एकाएक इलाके में सन्नाटा पसर गया.  मेरी बालक बुद्धि पूरी कोशिश करके भी मामला समझ नहीं पा रही थी.  माजरा तब जाकर समझ आया जब मेरे एक दोस्त ने बड़े आश्चर्य से पूछ डाला, "पिक्चर नहीं देखना है क्या?" और वो खुद भागता हुआ अपने घर घुस गया.

मुझे पता नहीं था कि आज सन्डे है और दूरदर्शन पर साप्ताहिक सिनेमा आने वाला था.  वो भी फ़ारूख शेख़ और रेखा की "बीवी हो तो ऐसी."  मूवीज़ में बहुत कम रुची थी मेरी.  इसलिए अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठा और  सामाजिक तौर पर बहिष्कृत सा फील करने लगा.

आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला.  इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी.  मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.

ऐसा होता था सिनेमा का क्रेज़ तब.  एक फिल्म देखने के लिए सात दिनों का इंतज़ार किसी भी मूवी को मदर इंडिया और शोले के टक्कर का बना देता था.  टीवी का मतलब ही दूरदर्शन होता था.  आज तो

April 18, 2011

मृगतृष्णा

मेरे हर पल अब हैं तुम्हारे
क्या तुम्हारी साँसों पर भी है मेरा नाम
या हम उस फूल की मात्र खुशबू तो नहीं
जो मसलते हाथों को सुगन्धित करे, घायल नहीं


क्या हो तुम वो बहता निर्मल झरना
एक रहस्य, या मेरा आईना
या बस बढ़ाती हो इन बहारों की सुन्दरता
बनकर मेरे नैनों की मृगतृष्णा


अरी मृगतृष्णा, तुम तो मेरी आँखों का छल हो
पर हृदय कहे तुम मेरी हरदम हरपल हो
जिसमें मैं मदहोश होकर डूबा हूँ
उस झील में खिला तुम कँवल हो


क्या हो तुम वो चाँद चकोरी
जो करती है आँखों की प्यास पूरी
पर मेरा कभी हो नहीं सकता
रह जाती हैं मेरी हसरतें अधूरी


क्या सही है तुम पर मेरी दावेदारी
या हो बस एक कल्पना कोरी
क्या कहीं है ऐसी कोई डोरी
जो जोड़ने की हो कड़ी हमारी


तुम मेरी ताकत हो या कमजोरी
मेरे नज़दीक हो, या है मुझसे दूरी
मेरे हैं ऐसे कुछ सवाल
जवाब सारे तुम करोगी पूरी..

April 7, 2011

मोहाली महोत्सव !!

मोहाली के फेज़ 1 मार्केट में बैठे थे हम जब इंग्लैंड से आये एक फिरंगी जोड़े से बात हुई.  परेशान से दिख रहे दंपत्ति पानी की बोतल लेने आये थे.  "People are crazy here!! There is such a long queue at the stadium... Horrible!!", झुंझलाई हुई लड़की बड़बड़ाने लगी.  वो कहने लगे कि उनके यहाँ तो टिकेट्स ऑनलाइन बुक कर लेते हैं और मजे से बीयर पीते हुए मैच देखते हैं.

मेरे साथ बैठे लोग मुस्कुराने लगे.  फिर उनको बताया कि यहाँ काउंटर से भी टिकट खरीदने पर गारंटी नहीं कि आप स्टेडियम में घुस जाएँ.  बेचारों के चेहरे का रंग उड़ गया और वो होर्रिबल, टेर्रिबल करते करते वहाँ से चले गए.

March 25, 2011

एक थी साईकिल..

सातवीं क्लास में पढ़ते थे हम.  आज भी याद है.  शनिवार की शाम थी.  पापा की छुट्टी का दिन, जब मेरी नयी साईकिल घर आई थी.  BSA SLR, 18 इंच!


शाम को माँ के कहने पर थोड़ी देर के लिए किताब खोल कर बैठ गए, क्यूंकि इसी शर्त पर तो साईकिल खरीदी गयी थी.  लेकिन, किताब के पन्नो पर भी मुझे मेरी नव अर्जित संपत्ति ही दिख रही थी.  आश्चर्य लग रहा था कि कैसे माँ-पापा साईकिल छोड़ दीन-दुनिया की बातें कर रहे थे.  कैसे TV पर कुछ अलग नहीं हो रहा था, और कैसे हर रात की तरह आज भी खाना खा, दूध पीकर मुझे सो जाना था.  असल में, मेरे लिए तो सब बदला बदला सा था.  दुनिया रंगीन लग रही थी, मानो जीवनसाथी मिल गया हो.

रात भर हम यही सोचते रहे कि कब सुबह हो और अपनी नयी दुल्हन को दिन के उजाले में देखें.  इंतज़ार करना कठिन होता जा रहा था.  इतना कि आँख लगी तो सपने में ही साईकिल चलाने लग गए.  नए मेहमान के लिए ऐसा शौक-ए-दीदार कि रात ढाई बजे ही नींद भी खुल गयी.  और अगले आधे घंटे प्राणप्रिये के दर्शन में ही बीत गए, सुबह की योजना बनाते बनाते.

तभी कमरे से आवाज़ आई, "अनुपम!" और माँ से डांट पड़ गयी.  मन मार, दिल पर पत्थर रख हम  वापस सो गए.

ये तो मेरा अपना

March 18, 2011

Women- Better or the Bitter Half!

Life begins from a Lady's womb. The sole Privilege and Power to create- Srijan- is what makes her the lord of this world in the true sense. She is the force behind every man in one form or the other- Mother, Wife, Sister, Daughter and so on. But all these sound mere rhetoric and speechifying when the majority suppresses and downgrades its Better half, making them no more than a Bitter Half.

And, I'm dejected to say that the world comprises more of rhetoric and less of substance. Some on the part of Men who profess and preach of liberty and equality of the fairer sex but never practice it, and to some extent, on the part of Women whose cynicism and frustration towards men fill them with vengeance and negativity leading them nowhere ahead.


While on facebook, I had recently quoted a UN source that said, “Women do 66% of the world's work and produce 50% of the food but earn10% of the income & own 1% of the properties!" There was a female who pounced upon me like a Kali, and later even declared to me that I better beware of Kali! She was deeply revengeful of Men and her comments filled with negativity all around. She talked of Women empowerment but was herself so frustrated & prejudiced that her rhetoric didn't match her intentions. She may have found my facebook update a mockery of Women, whereas, in fact, it was meant to shed some light on the sorry state of our Battered half. The world can not move ahead with gender confrontations. Rather, women and men are made to and have to compliment each other for humanity to progress.

Feminism today has predominantly become male-bashing and measuring up women on the parameters that define men and masculinity. Women are the prime-movers of society and Feminism should strive to replenish, rejuvenate and strengthen this prime-mover. A woman should be able to look into the eyes of a man and disagree or disapprove of him. This is, what I believe, is true empowerment, and gladly, there are women around us who perform this role with panache and aplomb.

Thus, fighting for women rights, dignity and respect comes at a later stage or rather superficial level. Society's prime concern should be to make Ladies out of females. Women, at an individual level, should strive to be ladies par excellence, so should Men. One female role model in a locality can achieve much more than what feminism movements or women rights activism can do. These movements, after all, will always run parallel to our society as tools of socialism without any substantial percolation to the grass-root level.

Now, talking of men, I agree that we are the biggest deterrent in women empowerment. We love, admire, respect and care for ladies- our mother, wife, sisters, daughters. We acknowledge their role in our upbringing, our support system, our inspiration, but only until all these women in our lives revolve unobtrusively around our success and persona with a nondescript presence. A lady plays her part with utmost missionary zeal. At times, far greater than a man ever does. But she is endorsed by the society only when the benefits of her mission is reaped by the male. The moment you see a Woman dwarfing your persona, you are hit by a Tsunami. You can never be a woman's support system if her dynamism and charisma overpowers or rises above you. Here, my mind strikes of a movie "Abhimaan" which beautifully showcased a couple's relationship being marred by this unjustified sub-conscious tendency of men to dominate. You could be the most subdued personality in the world, but you can't manage to see your wife dictating terms to you. Yes, its discomforting but true to the core!

January 8, 2011

Ganga (In)action Plan !!


Originating from Gaumukh in the Gangotri glacier as a stream called Bhagirathi and culminating in Gangasagar, Ganga enlivens a culture and establishes a habitat along its 2,525 km bank. This holy river has been an epitome of Indian cultural and spiritual heritage since eternity. Infact, we can better say that India once lived on the banks of Ganga, but unfortunately today, India is crawling on its banks.


The Ganges, which once was a symbol of India’s spiritual supremacy, today symbolizes our inefficiency, inaction and ignorance, drawing a sorry state of affairs and ignorant bliss.

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