April 18, 2011

मृगतृष्णा

मेरे हर पल अब हैं तुम्हारे
क्या तुम्हारी साँसों पर भी है मेरा नाम
या हम उस फूल की मात्र खुशबू तो नहीं
जो मसलते हाथों को सुगन्धित करे, घायल नहीं


क्या हो तुम वो बहता निर्मल झरना
एक रहस्य, या मेरा आईना
या बस बढ़ाती हो इन बहारों की सुन्दरता
बनकर मेरे नैनों की मृगतृष्णा


अरी मृगतृष्णा, तुम तो मेरी आँखों का छल हो
पर हृदय कहे तुम मेरी हरदम हरपल हो
जिसमें मैं मदहोश होकर डूबा हूँ
उस झील में खिला तुम कँवल हो


क्या हो तुम वो चाँद चकोरी
जो करती है आँखों की प्यास पूरी
पर मेरा कभी हो नहीं सकता
रह जाती हैं मेरी हसरतें अधूरी


क्या सही है तुम पर मेरी दावेदारी
या हो बस एक कल्पना कोरी
क्या कहीं है ऐसी कोई डोरी
जो जोड़ने की हो कड़ी हमारी


तुम मेरी ताकत हो या कमजोरी
मेरे नज़दीक हो, या है मुझसे दूरी
मेरे हैं ऐसे कुछ सवाल
जवाब सारे तुम करोगी पूरी..

April 7, 2011

मोहाली महोत्सव !!

मोहाली के फेज़ 1 मार्केट में बैठे थे हम जब इंग्लैंड से आये एक फिरंगी जोड़े से बात हुई.  परेशान से दिख रहे दंपत्ति पानी की बोतल लेने आये थे.  "People are crazy here!! There is such a long queue at the stadium... Horrible!!", झुंझलाई हुई लड़की बड़बड़ाने लगी.  वो कहने लगे कि उनके यहाँ तो टिकेट्स ऑनलाइन बुक कर लेते हैं और मजे से बीयर पीते हुए मैच देखते हैं.

मेरे साथ बैठे लोग मुस्कुराने लगे.  फिर उनको बताया कि यहाँ काउंटर से भी टिकट खरीदने पर गारंटी नहीं कि आप स्टेडियम में घुस जाएँ.  बेचारों के चेहरे का रंग उड़ गया और वो होर्रिबल, टेर्रिबल करते करते वहाँ से चले गए.
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