September 11, 2011

मैं अन्ना नहीं !!

बड़े दिनों से मैं कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन आज जाकर कलम घिस पा रहा हूँव्यस्तता की दुहाई मैं नहीं दूंगाअसल में अन्ना हज़ारे ने मुझे बाँध सा लिया थाऐसा माहौल बना दिया कि भ्रष्टाचार के अलावा कुछ और लिखना मेरी काबीलियत से परे हो गया थाऔर अन्ना या उनके महा-आन्दोलन पर एक आलोचक की तरह लिखना मेरी हिम्मत से परे था. इस पवित्र आन्दोलन पर कोई समीक्षा सबको नागवार गुज़रती और आप मुझे ही भ्रष्टाचारी होने का तमगा दे देते. 

ख़ैर मैंने लिखा तो कुछ नहीं, लेकिन इस सीज़न को करीब से देखने और समझने की पूरी कोशिश कीबड़ा ख़ुशगवार सा मौसम था ये.  क्यूंकि, तरह तरह के घोटालों की गूँज के बाद अब जनमानस के गूंजने की बारी आयी थी.  ये सीज़न उम्मीदों का था, लोगों की संवेदनाओं का और सरकार से सवाल का था.  फिजा में ऊर्जा थी, भाईचारा था और साथ ही भ्रष्टाचार के प्रति अथाह आक्रोश.  माहौल ऐसा कि कलमाड़ी और राजा तिहाड़ में ही ज्यादा सुरक्षित फील कर रहे थे.  यदि बाहर भी होते तो "मैं अन्ना हूँ" लिखी टोपी पहनकर घूमते.

आन्दोलन से हमें एक चिंताजनक बात ये मालूम पड़ा कि देश में हर कोई खुद को ही अन्ना बताने लगा है.  भारत के गाँव-गाँव गली-गली में आपको "अन्ना" मिल जाते.  सबके सब अन्ना, पूरा देश अन्ना बन गया!  फिर इस आन्दोलन की आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी, किस से लड़ रहे हैं हम?


ज्वलंत से इस मौसम में मैंने अपने देश और देशवासियों के बारे में बहुत कुछ देखा और समझा.
लालू यादव जब आन्दोलन का विरोध करते हैं और "मैं अन्ना हूँ" बोलने से इनकार करते हैं, तो हमें समझ आता है.  इसमें उनकी सच्चाई झलकती है.  लेकिन जब बाकी का पूरा राष्ट्र खुद को अन्ना बताता है तो इसमें दोगलापन झलकता है.  मौकापरस्ती झलकती है, कौंग्रेस सरकार की कमजोरी और अन्ना की ताकत झलकती है.



अनशन और आन्दोलन के उस ख़ुशमिज़ाज़ मौसम में खुद को भ्रष्टाचार विरोधी साबित करने के लिए बस तीन चीज़ें चाहिए थीं - एक मोटर-साइकिल, एक तिरंगा और कुछ खाली समय.  ऐसी लहर चल रही थी कि मधु कोड़ा भी कहीं मोटर-साइकिल चलाते पाए जा सकते थे.


मैंने दिल्ली में अन्ना की टोपी पहने हुए शराबियों को हुर्दंग करते भी देखा है.  चंडीगढ़ में दिन भर नारे लगाने वालों को रात में २५ का माल ३० में बेचते हुए भी देखा है.  ऐसे लोगों के लिए अन्ना एक मुखौटा भर हैं अपनी गन्दगी को छुपाने का.  भारत में भ्रष्टाचार किस गंभीर हद तक जड़ें जमा चूका है ये इसी बात से समझ आ जाती है कि हमें अपनी इमानदारी स्थापित करने के लिए अन्ना का नाम चाहिए, अपना नहीं.

मुझे पता है कि मैं अन्ना नहीं हूँ, अनुपम हूँ..!!

आप कौन हैं?  क्या आपको भी इमानदार बनने के लिए अन्ना का सहारा लेना पड़ रहा है?
अगर हाँ, तो जो अन्ना टोपी कल बीस रूपये में बिक रही थी, आन्दोलन ख़त्म होते ही उसकी कीमत घट गयी है.  जाइये, अब तो पाँच रूपये में ही आप भ्रष्टाचार विरोधी बन सकते हैं।।

7 comments:

  1. anshan ke madhyam se hi kai log galat kaam karte hai, duniya ko lutate hai, niyam kanoon torte hai aur kehte hai hum achhai ke sath hai aur uske liye hi lar rahe hai.

    udahran ke taur par delhi police ka bayan to aapne suna hi hoga ki log anshan ke dauran bike pe tripple loading, bina helmet oore jaa rahe hai.

    kaanoon ka to ye bhi kehna hai ki 30 mg se jyada nahi hona chahiye par ek driver to 12 guna jyada nashe me tha.

    aap hi batayiye kaun kahega ki ye bhrashtachar rokne ka tarika hai....

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  2. बधाई हो सर.
    क्या स्टाइल है आपका एक अत्यंत ही गंभीर मुद्दे को करिश्माई ढंग से पेश करने का!!

    अन्ना ने तो अनशन कर लिया और देश ने एक आन्दोलन के दर्शन भी किये लेकिन कितना तर्कसंगत है हम सब का ये कहना की "मैं अन्ना हूँ"?
    आपका सवाल बहुत जायज़ और चुभने वाला है.
    अन्ना पर लिखे गए सभी लेखों से अलग और हटके है आपकी ये ज़बरदस्त रचना.

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  3. Humko pata tha ki is mudde par aapke vichaar aise hi honge. lekin kuchh to asar jaroor hua hai is andolan ka Vrastachariyon par. Sab ke sab defensive ho gaye hain.
    BTW SIR VERY WELL WRITTEN AS USUAL.....

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  4. Shaayad aap sahi hain... 'Main anna hoon'ek shosha slogan se zyada shaayad kuchh na ho adhikaansh jantaa ke liye lekin isne ek sote hue rashtra ko jhinjhod kar jagaane ki jurrat zaroor ki hai....Aur hamaara vishwaas hai ki kabhi kabhi pehredaar ka neend se jaagna bhar bahut hota hai, chor ko daraa kar bhagaane ke liye.....

    lekin ab yahi darkaar hai ki pehredaar jagaa rahe... kahin phir se so gaya toh ab ki baar chor nahi darega...

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  5. Dost,mera samajhna hai ki ..hum sab apne life mein Heros, superheros..the perfect individuals ko kahi na kahi apna role model banane ki tendency rakhte hain...kyunki hum apne aap ko as a social union kuch bhi accomplish nahi karte dekh paate.There were many freedom fighters...but we only tend to remember one baap of our country!!!YEH napunsakta hai.Society ka element hai human being...Corruption tabhi hatega..jab hum Anna ki nahi apni topi pehenne ke kaabil banenge...Peace ;-)

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  7. Dhannyawad..! Yeh samzane ke liye ki Lau Yadav jaise Neta, sachche hai, aur saari janata dooglepan se bhari hai...!

    Lalu agar khule aam chara ghotala karte hai, aur phir kehete hai ki 'mai Anna nahi hu' to wo sachche hai....!

    Magar aam aadmi ko, sarkari babu zabardasti rishvat dene ko majboor kare, to aam aadmi bhrasht hai....! Aur aam aadmi bhrashtachar virodhi aandolan me shamil ho to uska dooglapan hai...!

    Anupam ji bahut badhiya...!

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